Saturday, October 13, 2012

मुख़्तसर नफरत थी जिससे मुझको !
कलाम-ए-मोहब्बत भी उसी पे निकले !!

हर मुलाक़ात पर वो रज्म-ए-लब्ज !
गुफ्तगू कें बहाने भी उसी के निकले !!

दिखता था हुस्न, बुर्खे  की दीवार से !
मगर बाजारों में चेहरे भी उसी के निकले !!

ख़ाक हुआ नशा -ए- इश्क  उसके ही इरादों से !
वे सुरत के शौकीन होकर सीरत की राह पे निकले !!

-----भारत-----

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