Wednesday, May 30, 2012

--बें बात की बात--

--बें बात की बात--

वाह ! क्या वक्त था

जब प्यार हुआ

ना मैनें बात की

ना उसने शुरुआत

लोगो ने शेखी बरती

ऑर फलक पर

बात पहुच

बनी करामात

इस मुहं से

कभी उस मुह से

न जाने किस किस

के मुह से

निकल पडी एक ही बात

"क्या चक्कर है "

बातो का काफीला

गुजरा जिधर से

तो कुछ हमने सुना

कुछ सुन वे मुस्कुरा गए

देर ना हुई

निगाहों को भी

वे बातो से ना सही

तो इशारो से ही

बतीया गए

निगाहें, निगाहों से

ना हो सकी

आबाद

ओर हम हो गए

बेवजह बरबाद

वक्त गुजर चुका

वो अपने घर को चले

हम खुद के शहर को

कुछ याद लिए

कुछ मोहब्ब्त का

बोझ लिए

आज अर्से बाद भी

एक याद लिए

मुस्कुराते है

अनजाने मे भी हम

उनसे बात क्यु

नही कर पाते थे ?

बिन बातो से हुई

पहली मोहब्बत

आज भी

निगाहें घेरकर

दिल बिखेरती है

मन चहकता है

मैं महकता हु

वो हवा बन कर आती है

मैं चिराग बन

बुझ जाता हुं

नादान था मैं उस वक्त

अनजान थी वो परी

तभी कुछ लोगो ने

बना दी अपनी

मनचाही कहानी   !!!!!

              -- भारत शोभावत कोटडी --   

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Friday, May 25, 2012

चाहत :

         -- "श्री हनुमान जी (बाप जी) को अर्पणम् "--


मैं परिन्दा तेरे खुले कफश का !

खुद को छोड सिर्फ तुझे चाहुं !!


तु सागर है इस जमाने का !

मैं मौज बन लहरना चाहुं !!


तु दीवाना है मौजी कलंदर का !

मैं नजराना बन तुझे ही पाऊ  !!


बादशाह है तु इस महखाने का !

मैं पी-पी कर सबको पीलाऊ  !!


                        --भारत--   


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Wednesday, May 23, 2012

"अपनी कलम के कलाम "



दुकां की वे पतंग एक ही कफश के परीन्दे थी !

फलक में क्या गयी उसके अपनो ने ही काट डाला!!

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उस गूफ्तगू के पीछे  किताबें  रूठ गयी थी  !

अच्छा हुआ तुम चले गये किताबें अपनी हो गई  !!

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निगाहें, निगाहों के खेल मे, हो जाती है बरबाद  !

रूक, बह, फिर संभले ,समझो हो गए आबाद  !!            

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भीग़ी मिट्टी :


बारिश का मिट्टी छूना ,

तेरी याद का आना .....

कुछ अजीब है  !!


महक को दिल से लगा ,

खामोश होकर भूल जाना .....

कुछ अजीब है  !!    

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खुद के लिए जीना है ...

मगर खुदगर्ज बनकर नही !


आशीयाने हजारो देखे ...

पर अपना हुआ ना कोई  !!

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मक्कारो की दहशत मे

न जाने कब होगी रहमत

क्यु न हमतुम करे दुआं पर मेहनत 

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प्रखरो का अजीब अर्ज है !

ज़िम्मा उठाना ही दर्द है ,

झुककर हटे वो नामर्द है

गर अनसुना करे समझो खुदगर्ज है   !! 

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हयात उस दर को ना लगी जो मेरा ठिकाना था !

कम्बख्त उस कदर चल पडी जेसा मेनें संवारा था !!

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  इश्क कर इस कदर बनी सोच  !

बेगाने होकर भी वे अपने लगते है  !!

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आज िफर फरेब के जंगल मे फस गया  "भारत" 

वो बेवकूफ बना गयी लोगो ने आवारा कह डाला

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इल्म के इस सागर मे 'भारत' तू ऐसी मोज बन  !

अपनो को तू रोशन कर ओरो को दे अपनापन  !!

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हुस्न के उस आँगन पर हम , निगाहो को ना रोक पाए।

उसने पल्लू क्या सुधारा, हम खुद को ही ना देख पाए।।

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शेखी इस कदर कर  की अनजाने अपने हो जाए  !

दीवाने को मत देख पगली कही प्यार ना हो जाए  !!

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वतन को छोड गर तु इन्सानी मोहब्बत का परीन्दा होता !

तो उस खून खराबे को ना देख खुदा भी तेरा दिवाना होता !!

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                  --भारत--  


  


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Tuesday, May 22, 2012

" KHAMOSHI "


खामोश थे तुम ,
चुप थी मै ,
गुफ्तगू बहुत सारी हुई !!!!!


जव़ाब --


बातो का सिलसिला चल पडा , फिर भी  हम खामोश रहे !
कद्रदा हमें ऐसा मिला, जो खामोशी समझ कर भी चुप रहे !!

बात फलक तक गयी ,तो क्या पता अपने अपने ना रहे !
अपनों के लिए क्यों ना तुम चुप रहो ओर हम खामोश रहे !!

ख़ामोशी को ऐसा आईना बना दू , जिसमे सिर्फ तेरी सीरत रहे !
चुप रह कर भी तुम खुश रहो , मै आईना देख खामोश रहू !!

मेरी मोहब्बत ऐसा घरोंदा बन चुकी ,जिसे हम खुद बनाकर तोड़ रहे !
चाहत इबादत बन चुकी फिर भी , दुआं के कबुल होने से डर रहे !!

बात न बन सके तो कोई गम नही , आरजू है हम दोस्ती निभाते रहे
"भारत"  खामोश तुम चुप रहो , ओर यह गुफ्तगू यूही चलती रहे !!


-----भारत-----
 


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Sunday, May 20, 2012

जिंदगी और मंजिल :

जिंदगी और मंजिल :


इस बाजार से गुजरने का दिल नही करता !

उनकी उस बातो में अब मन नही लगता !!


सागरों में नदियों का कोई नाम नही रहता !

मफरूजा का सागर मुझे डुबा नही सकता !!


जिंदगी मौज है जिसका एक किनारा नही होता !

गिर कर भी जो संभले वो कभी राख नही होता !!


नाज़ में उडा परिन्दा सितारे छु नही सकता !

उठा जो पां जमी से फलक मे चल नही सकता !!


रोशनी के इस बाजार में अब चिराग नही जलता !

आंखे है मगर फिर भी 'भारत' देख नही सकता !!


                                          --भारत--   


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Wednesday, May 16, 2012

Halaat -e- hind

जमाना मुतजाद बन चुका है, करतार  !

लोग चाहकर भी नही रहते बरकरार  !!


चन्द शेखी से जो बन गए तक्कार  !

दुनिया जानकर भी ना करती उनको इन्कार  !!


कल तक थे जो पैदाईशी  मक्कार  !

आज दिल्ली के बन चुके हकदार  !!


जिनमें थी केवल हवस की मिक़दार   !

आज वे ही है देश के पहरेदार  !!


हे खुदा, ऐसा परींदा कर नूमदार  !

गरीबो का मसीहा जो 'भारत' मे रहे सदाबहार   !!


                               --भारत--



करतार =  ईश्वर

तक्कार =  वक्ता

मिक़दार = मात्रा

नूमदार =  प्रगट

                     


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मां

अर्से बीत गये घर से निकले वो बात साथ निभाती है !

मुझे दिन  मे एक बार मेरी मा की याद सताती है !!


मुझसे बात कर वह एक ही बात बतलाती है !

खाने का जिक्र कर वो हाथो की याद दिलाती है !!


मेरे झुकने से पहले ही मां मुझे गले से लगाती है !

लफ्जो की बहार के साथ वो दुआं को ले आती है !!


खुद जाग कर मां मेरी मुझे सुलाती है

प्यारे अफसाने बता मां मुझे घर को बुलाती है !!


मंजिल राह मे 'भारत' दीवानगी चमकती है !

मां से दूर रह कर भी मां हमेशा संग चलती है  !!             

     

                                 --भारत--  


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कश्मकश

लम्हे बीत गये एक ही कश्मकश में !

कोई ना कोई बात जरुर थी उस शख्स में !!


वो देखती रही हमे उस नजर से !

की मैं खुद बह गया अपने ही अश्क में !!


जहां भी गया मैं उसे ढूंढता रहा !

शायद खुदा का नूर था उस शख्स में !!


दुआं है वो उडती रहे सदा फलक में !

'भारत' खुश है अपने ही कफश में !!


                            --भारत--






सधन्यवाद----» आरीफ व बाहरठ

   


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Tuesday, May 15, 2012

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॥ हनुमान चालीसा ॥ भावार्थ सहित ..

कृपया अधिक से अधिक प्रेमी भक्त सेयर करे .. धन्यवाद् .. जय श्री राम


॥ दोहा ॥

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुरसुधारि।

बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौ पवन कुमार।

बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस विकार॥


भावार्थ : मैं सदगुरु के चरण कमलों कीधूल से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके, श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ जो (धर्म, अर्थ, काम औरमोक्ष रूपी) चारों फलों को देनेवालाहै। मैं स्वयं को अज्ञानी और निर्बल जानकर, पवन-पुत्र श्री हनुमान जी का स्मरण करता हूँ जो मुझे बल, सद्‍बुद्धि और ज्ञान प्रदान करेंगे और मेरे दुखों व दोषों का नाश करेंगे।


॥ चौपाई ॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ (१)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपकी जय हो, आपज्ञान और गुण के सागर हैं, हे कपीश्वर!आपकी जय हो, आपका यश तीनों लोकों (स्वर्ग-लोक, पृथ्वी-लोक, पाताल-लोक) में फ़ैला हुआ है। (१)


राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्रपवनस ुत नामा॥ (२)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आप श्री राम जी के दूत हैं, आप अपार शक्ति के भण्डार है, आप माता अंजनि के पुत्र हैऔर आप पवन देव के पुत्र नाम से जाने जाते हैं। (२)


महावीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥ (३)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आप महान वीर है, आप विशेष पराक्रमी हैं, आपका वज्रके समान अंग है, आप दुर्बुद्धि को दूरकरते हैं और सुबुद्धि प्रदान करते हैं। (३)


कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥ (४)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपका स्वर्ण के समान रंग हैं, आपका सुन्दर वेश हैं, आपके कानों में कुंडल हैं और आप घुंघराले बालों से सुशोभित हैं। (४)


हाथ वज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँजजनेऊ साजै॥ (५)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आप हाथ में गदा और ध्वजा धारण करते हैं, आपके कंधेपर धागों का जनेऊ शोभायमान है। (५)


शंकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥ (६)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आप शिव जी के अवतार और केसरी के पुत्र हैं, आपके पराक्रम का और आपके यश का सारा संसार गुणगान करता है। (६)


विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥ (७)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आप प्रकाण्ड विद्वान, आप गुणवान और अत्यंत कार्यकुशल हैं, आप राम जी के कार्य करने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं। (७)


प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लषन सीता मन बसिया॥ (८)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपको प्रभु श्रीराम जी के चरित्र सुनने में आनन्द-रस मिलता हैं और राम, सीता और लक्ष्मण आपके ह्रदय में वसते हैं। (८)


सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा॥ (९)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपने अपना छोटा रूप धारण करके सीता माँ को दिखाया, और विकराल रूप धारण करके लंका को जलाया। (९)


भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र केकाज सँवारे॥ (१०)


भावार्थ : हे हनुमान जी! भयंकर रूप धारण करके राक्षसों का विनाश किया औरप्रभु श्रीराम के सभी कार्य सिद्ध किये। (१०)


लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥ (११)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की, प्रभु श्रीराम ने आपको हर्षित होकर हृदय से लगा लिया। (११)


रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥ (१२)


भावार्थ : हे हनुमान जी! प्रभु श्रीराम ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि तुम मेरे भरत के समान प्रिय भाई हो। (१२)


सहस बदन तुम्हरो जस गावै। अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥ (१३)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपका यश हजारों मुखों से गाने योग्य है, ऐसा कहकर सीता जी के पति प्रभु श्रीराम नेआपको गले से लगा लिया। (१३)


सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारदसहित अहीसा॥ (१४)


जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोविद कहि सके कहाँ ते॥ (१५)


भावार्थ : हे हनुमान जी! सनक कुमारों (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत) सहित सभी ऋषि, ब्रह्मा जी सहित सभी देवता, मुनिनारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी, यमराज जी, कुबेर जी, सभी दिशाओं के रक्षक, कवि और विद्वान आदि भी आपके यशका पूर्ण रूप से वर्णन नहीं कर सकतेहैं। (१४,१५)


तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राजपद दीन्हा॥ (१६)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपने सुग्रीव जी पर उपकार किया, प्रभु श्रीराम से मिलाकर उनको राज्य दिलाया। (१६)


तुम्हरो मंत्र विभीषन माना। लंकेश्वरभए सब जग जाना॥ (१७)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपके उपदेश कापालन करके विभीषण जी लंका के राजा बनेसमस्त संसार यह जानता है। (१७)


जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥ (१८)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपने हजारों योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को मीठा फल समझ कर निगल लिया। (१८)


प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं॥ (१९)


भावार्थ : हे हनुमान जी! प्रभु श्रीर


प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं॥ (१९)


भावार्थ : हे हनुमान जी! प्रभु श्रीराम की अंगूठी को मुख में रखकर आपसमुद्र को पार किया, यह आपके लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।


दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रहतुम्हरे तेते॥ (२०)


भावार्थ : हे हनुमान जी! इस संसार के सभी कठिन कार्य आपकी कृपा से सहज और सुलभ हो जाते हैं।


राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥ (२१)


भावार्थ : हे हनुमान जी! प्रभु श्रीराम के द्वार की आप सुरक्षा करतेहैं, आपके आदेश के बिना वहाँ कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता है। (२१)


सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छककाहू को डरना॥ (२२)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपकी शरण ग्रहण करके सभी सुखी हो जाते हैं, जब आप रक्षक हैं तब किससे डरने की आवश्यकता है। (२२)


आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँकतें काँपै॥ (२३)


भावार्थ : हे हनुमान जी! अपनी महान शक्ति को आप ही सँभाल सकते हैं, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँपने लगते हैं।(२३)


भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥ (२४)


भावार्थ : हे हनुमान जी! भूत-पिशाच आदिदुष्ट आत्माऎं उनके पास नहीं आतेहै,जोआपके नाम का गुणगान करते हैं। (२४)


नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ (२५)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपके महान नामका निरंतर जप करने वालों के सभी रोगोंका नाश हो जाता है और सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं। (२५)


संकट तें हनुमान छुडावैं। मन क्रम बचनध्यान जो लावै॥ (२६)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आप सभी संकटोंसे उनकी रक्षा करते हैं जो मन से, शरीरसे और वाणी से सदा स्मरण करते है। (२६)


सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥ (२७)


भावार्थ : हे हनुमान जी! सभी से श्रेष्ठ प्रभु श्रीराम तपस्वी राजा हैं, आपने उनके भी सभी कार्यों को सहजकर दिया। (२७)


और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥ (२८)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आप की कृपा से मन की सभी इच्छायें पूर्ण होती हैं, औरतुरन्त अकल्पनीय फल प्राप्त हो जाते हैं। (२८)


चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥ (२९)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपके यश का प्रकाश चारों युगों (सतयुग, त्रैतायुग, द्वापरयुग, और कलियुग) में रहता है, जिससे सम्पूर्ण संसार प्रकाशित होता है। (२९)


साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदनराम दुलारे॥ (३०)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आप सज्जनों कीरक्षा करते है, दुर्जनों का विनाश करते है इस कारण आप प्रभु श्रीराम के प्यारे हैं। (३०)


अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥ (३१)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आप आठों सिद्धियाँ और नौ प्रकार की सम्पत्ति को दे सकते हैं, ऐसा वरदान आपको माता सीता से प्राप्त है। (३१)


राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥ (३२)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपके पास प्रभु श्रीराम के नाम की औषधी है, जिससे आप सदा प्रभु श्रीराम की शरण में रहते हैं। (३२)


तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥ (३३)


भावार्थ : हे हनुमान जी! आपके स्मरण सेमनुष्य प्रभु श्रीराम को प्राप्त करके जन्म- जन्मान्तर के सभी कष्ट भूलजाते हैं। (३३)


अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि- भक्त कहाई॥ (३४)


भावार्थ : हे हनुमान जी! जो मनुष्य अंतसमय में आपका स्मरण करते है वह वैकुण्ठ में जन्म लेकर भगवान का भक्तकहलाता है। (३४)



और देवता चित न धरई। हनुमत से हि सर्वसुख करई॥ (३५)


भावार्थ : हे हनुमान जी! मनुष्य को अन्य देवताओं की पूजा करने की आवश्यकता नही रहती है, आपके स्मरण से ही सभी सुखों की प्राप्ति हो जाती है।(३५)


संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥ (३६)


भावार्थ : हे हनुमान जी! जो आपकी वीरताका गुणगान करता है उनके सभी विपत्तियों का नाश हो जाता है और सभी कष्ट मिट जाते है। (३६)


जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नाई॥ (३७)


भावार्थ : हे हनुमान जी! भक्तों की रक्षा करने वाले आपकी की जय हो, जय हो,जय हो, आप मुझ पर गुरु की तरह कृपा करें। (३७)


जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महासुख होई॥ (३८)


भावार्थ : जो कोई इस हनुमान चालीसा कासौ बार पाठ करेगा, वह जन्म-मृत्यु के बंधन से छूटकर परम-आनन्द को प्राप्त करेगा। (३८)


जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा। होय सिद्धिसाखी गौरीसा॥ (३९)


भावार्थ : जो मनुष्य इस हनुमान चालीसाको पढे़गा है उसको श्री शंकर भगवान कीकृपा से निश्चय ही सफ़लता प्राप्त होगी। (३९)


तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ ह्रदय महँ डेरा॥ (४०)


भावार्थ : श्री तुलसीदास जी कहते हैं,मैं सदा श्रीराम का सेवक हूँ, हे स्वामी! आप मेरे हृदय में निवास कीजिये। (४०)


॥ दोहा ॥

पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप।

राम लषन सीता सहित ह्रदय बसहु सुर भूप॥


भावार्थ : हे पवनपुत्र, संकटमोचन, आनन्द स्वरूप श्री हनुमान जी आप श्रीराम जी, सीता जी और लक्ष्मण जीके साथ मेरे हृदय में निवास कीजिये। — 


       ii ram ram ii


 


 


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