Saturday, January 26, 2013

बिजलियाँ गिरने लगी,लोग लाश होने लगे  !
तेरे संवरने के बाद, सब इल्जाम आने लगे !!  

पर्वत पत्थर पिघलने लगे, बादल बेवक्त रोने लगे !  
तेरे घर से निकलने पर, सबके चहरे बदलने लगे !! 

पंछी पंख भरने लगे ,फूल अब मुस्कुराने लगे !
तेरे मोहल्ले से गुजरने पर सब लोग चलने लगे !!

बाजार में हरकत होने लगी कई इशारे होने लगे !
तु रुकी दुकां पर तो लोग भी ग्राहक बनने लगे !! 

ग़ालिब दर्द छाने लगा अब याद फ़राज आने लगे !
तेरा अजनबी से मिलने पर हम तो शायर होने लगे !!            

♥..भारत..♥    

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Sunday, January 13, 2013

-पतंग-

--पतंग--

कुछ कागज के पन्नो
पर बिखरा था रंग
फिर उस पर बना
परीन्दे सा अंग
वो बेठी थी दुकां मे
अपनो के संग 
बनकर एक नयी पतंग..
फिर वक्त बदला
हयात बदली
वो दुकां से निकल के
किसी हाथ मे गयी  
खुद को मुकम्मल करने
अपने हालात का ढंग बदलने
हयात की भाषा समझने..
तभी एक दिन
डोर से हुआ मिलन
ओर जमी से उठ कर
फलक पहुची पतंग
सहारा मिलता गया
कद बढता गया
हर उचाई पर कोई
अपना मिलता गया
बिछडता गया...
फिर होश खोकर
कभी अपनो को काटा
तो कभी, बिन
दुश्मनी के परीन्दो को..
आख़िर वक्त
पराया होने लगा
कर्मो का फल मिलने लगा
कद खुद का घटने लगा
शिकारी भी ,
शिकार बनने लगा
डोर का रिश्ता टुटने लगा
जमी का रस्ता मिलने लगा
फिर उसी हाल मे
लोग कुचलने लगे
कल की पतंग को,
फिर कागज मे बदलने लगे...!!!!!
    
♥..भारत..♥ 

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Wednesday, January 9, 2013

हालात

दुश्मन इरादा अपना बताकर चला गया
हाथ मे देश का सर काट कर चला गया

बैठे हुए संसद मे चोर उचको पर,
कुता अब तमाचे मारकर चला गया

तुम जलाते हो चिराग देहलीज पर अपने
वो सीमाओ पर आग लगाकर चला गया     

जवान पाबंद-ए-हुक्म है हर पल सीमा पर
वो बिना हुक्म के हक जमाकर चला गया     

हम को तो खामोश रहना अब मौन खातीर
वो कीसी घर मे सन्नाटा फैलाकर चला गया

अब हूकूमत ए 'भारत' दिखती है मुर्दो सी
तभी हर कोई , इज्जत लूटकर चला गया

दुश्मनी पतंग की थी पतंग से मगर_ "भारत"
कोई पतंग परीन्दा काटकर चला गया                    

---भारत---

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