--पतंग--
कुछ कागज के पन्नो
पर बिखरा था रंग
फिर उस पर बना
परीन्दे सा अंग
वो बेठी थी दुकां मे
अपनो के संग
बनकर एक नयी पतंग..
फिर वक्त बदला
हयात बदली
वो दुकां से निकल के
किसी हाथ मे गयी
खुद को मुकम्मल करने
अपने हालात का ढंग बदलने
हयात की भाषा समझने..
तभी एक दिन
डोर से हुआ मिलन
ओर जमी से उठ कर
फलक पहुची पतंग
सहारा मिलता गया
कद बढता गया
हर उचाई पर कोई
अपना मिलता गया
बिछडता गया...
फिर होश खोकर
कभी अपनो को काटा
तो कभी, बिन
दुश्मनी के परीन्दो को..
आख़िर वक्त
पराया होने लगा
कर्मो का फल मिलने लगा
कद खुद का घटने लगा
शिकारी भी ,
शिकार बनने लगा
डोर का रिश्ता टुटने लगा
जमी का रस्ता मिलने लगा
फिर उसी हाल मे
लोग कुचलने लगे
कल की पतंग को,
फिर कागज मे बदलने लगे...!!!!!
♥..भारत..♥
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