दुकां की वे पतंग एक ही कफश के परीन्दे थी !
फलक में क्या गयी उसके अपनो ने ही काट डाला!!
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उस गूफ्तगू के पीछे किताबें रूठ गयी थी !
अच्छा हुआ तुम चले गये किताबें अपनी हो गई !!
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निगाहें, निगाहों के खेल मे, हो जाती है बरबाद !
रूक, बह, फिर संभले ,समझो हो गए आबाद !!
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भीग़ी मिट्टी :
बारिश का मिट्टी छूना ,
तेरी याद का आना .....
कुछ अजीब है !!
महक को दिल से लगा ,
खामोश होकर भूल जाना .....
कुछ अजीब है !!
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खुद के लिए जीना है ...
मगर खुदगर्ज बनकर नही !
आशीयाने हजारो देखे ...
पर अपना हुआ ना कोई !!
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मक्कारो की दहशत मे
न जाने कब होगी रहमत
क्यु न हमतुम करे दुआं पर मेहनत
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प्रखरो का अजीब अर्ज है !
ज़िम्मा उठाना ही दर्द है ,
झुककर हटे वो नामर्द है
गर अनसुना करे समझो खुदगर्ज है !!
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हयात उस दर को ना लगी जो मेरा ठिकाना था !
कम्बख्त उस कदर चल पडी जेसा मेनें संवारा था !!
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इश्क कर इस कदर बनी सोच !
बेगाने होकर भी वे अपने लगते है !!
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आज िफर फरेब के जंगल मे फस गया "भारत"
वो बेवकूफ बना गयी लोगो ने आवारा कह डाला
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इल्म के इस सागर मे 'भारत' तू ऐसी मोज बन !
अपनो को तू रोशन कर ओरो को दे अपनापन !!
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हुस्न के उस आँगन पर हम , निगाहो को ना रोक पाए।
उसने पल्लू क्या सुधारा, हम खुद को ही ना देख पाए।।
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शेखी इस कदर कर की अनजाने अपने हो जाए !
दीवाने को मत देख पगली कही प्यार ना हो जाए !!
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वतन को छोड गर तु इन्सानी मोहब्बत का परीन्दा होता !
तो उस खून खराबे को ना देख खुदा भी तेरा दिवाना होता !!
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--भारत--
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