Wednesday, May 23, 2012

"अपनी कलम के कलाम "



दुकां की वे पतंग एक ही कफश के परीन्दे थी !

फलक में क्या गयी उसके अपनो ने ही काट डाला!!

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उस गूफ्तगू के पीछे  किताबें  रूठ गयी थी  !

अच्छा हुआ तुम चले गये किताबें अपनी हो गई  !!

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निगाहें, निगाहों के खेल मे, हो जाती है बरबाद  !

रूक, बह, फिर संभले ,समझो हो गए आबाद  !!            

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भीग़ी मिट्टी :


बारिश का मिट्टी छूना ,

तेरी याद का आना .....

कुछ अजीब है  !!


महक को दिल से लगा ,

खामोश होकर भूल जाना .....

कुछ अजीब है  !!    

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खुद के लिए जीना है ...

मगर खुदगर्ज बनकर नही !


आशीयाने हजारो देखे ...

पर अपना हुआ ना कोई  !!

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मक्कारो की दहशत मे

न जाने कब होगी रहमत

क्यु न हमतुम करे दुआं पर मेहनत 

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प्रखरो का अजीब अर्ज है !

ज़िम्मा उठाना ही दर्द है ,

झुककर हटे वो नामर्द है

गर अनसुना करे समझो खुदगर्ज है   !! 

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हयात उस दर को ना लगी जो मेरा ठिकाना था !

कम्बख्त उस कदर चल पडी जेसा मेनें संवारा था !!

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  इश्क कर इस कदर बनी सोच  !

बेगाने होकर भी वे अपने लगते है  !!

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आज िफर फरेब के जंगल मे फस गया  "भारत" 

वो बेवकूफ बना गयी लोगो ने आवारा कह डाला

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इल्म के इस सागर मे 'भारत' तू ऐसी मोज बन  !

अपनो को तू रोशन कर ओरो को दे अपनापन  !!

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हुस्न के उस आँगन पर हम , निगाहो को ना रोक पाए।

उसने पल्लू क्या सुधारा, हम खुद को ही ना देख पाए।।

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शेखी इस कदर कर  की अनजाने अपने हो जाए  !

दीवाने को मत देख पगली कही प्यार ना हो जाए  !!

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वतन को छोड गर तु इन्सानी मोहब्बत का परीन्दा होता !

तो उस खून खराबे को ना देख खुदा भी तेरा दिवाना होता !!

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                  --भारत--  


  


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