Tuesday, May 22, 2012

" KHAMOSHI "


खामोश थे तुम ,
चुप थी मै ,
गुफ्तगू बहुत सारी हुई !!!!!


जव़ाब --


बातो का सिलसिला चल पडा , फिर भी  हम खामोश रहे !
कद्रदा हमें ऐसा मिला, जो खामोशी समझ कर भी चुप रहे !!

बात फलक तक गयी ,तो क्या पता अपने अपने ना रहे !
अपनों के लिए क्यों ना तुम चुप रहो ओर हम खामोश रहे !!

ख़ामोशी को ऐसा आईना बना दू , जिसमे सिर्फ तेरी सीरत रहे !
चुप रह कर भी तुम खुश रहो , मै आईना देख खामोश रहू !!

मेरी मोहब्बत ऐसा घरोंदा बन चुकी ,जिसे हम खुद बनाकर तोड़ रहे !
चाहत इबादत बन चुकी फिर भी , दुआं के कबुल होने से डर रहे !!

बात न बन सके तो कोई गम नही , आरजू है हम दोस्ती निभाते रहे
"भारत"  खामोश तुम चुप रहो , ओर यह गुफ्तगू यूही चलती रहे !!


-----भारत-----
 


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