खामोश थे तुम ,
चुप थी मै ,
गुफ्तगू बहुत सारी हुई !!!!!
जव़ाब --
बातो का सिलसिला चल पडा , फिर भी हम खामोश रहे !
कद्रदा हमें ऐसा मिला, जो खामोशी समझ कर भी चुप रहे !!
बात फलक तक गयी ,तो क्या पता अपने अपने ना रहे !
अपनों के लिए क्यों ना तुम चुप रहो ओर हम खामोश रहे !!
ख़ामोशी को ऐसा आईना बना दू , जिसमे सिर्फ तेरी सीरत रहे !
चुप रह कर भी तुम खुश रहो , मै आईना देख खामोश रहू !!
मेरी मोहब्बत ऐसा घरोंदा बन चुकी ,जिसे हम खुद बनाकर तोड़ रहे !
चाहत इबादत बन चुकी फिर भी , दुआं के कबुल होने से डर रहे !!
बात न बन सके तो कोई गम नही , आरजू है हम दोस्ती निभाते रहे
"भारत" खामोश तुम चुप रहो , ओर यह गुफ्तगू यूही चलती रहे !!
-----भारत-----
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