Friday, August 11, 2017

साधु

“साधु”

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साधु कौन है ? जो सहज है वो या जो सादगी में है वो। सहज तो हर कोई हो सकता है और सादगी युक्त भी हर कोई हो सकता है तो हम हर किसी को तो साधु नहीं कह सकते।

साधु एक स्वभाव है जो सहजता का परिचायक है संस्कृत में कहा गया है “साघ्नोती परकार्यमिती साधु:” जो दूसरे का कार्य कर देता है वह साधु है।

आम आदमी साधु तो हो सकता है पर संन्यासी नहीं हो सकता। साधु, संत, सन्यासी,महात्मा यह सभी नाम लेते ही एक चित्र नजर में आता है जो भगवा रंग या फकिरो का हरा रंग कुछ सफ़ेद रंग भी पहने होते हैं। उनको हम संत कहते हैं या साधु कहते हैं और भी काफी शब्द इजाद किए हुए है।

संत शब्द कि व्युत्पत्ति किस शब्द से हुई इसमें गर्त तक वैयाकरण ही जाने…. मगर सही अर्थ है शान्त व्यक्ति…. अर्थात क्रोध की जगह न हो।  

संत अपने वस्त्र आम लोगों से अलग धारण करते हैं वो चोले में होते है भगवा हरा सफ़ेद जो भी हो..

संत चोले में होता है इसलिए संत होता है या फिर वो संत के गुणों कि वजह से चोले में होता हैं।

यह भिन्न अवस्था है आप कि नजर पारखी होनी चाहिए कि संत सच में संत हैं या सिर्फ चोले को ही वंदन है।

संतों के अलग-अलग रुप है ….भारतवर्ष में तो बहुत से रुप देखने को मिल जाते हैं…. यहां नागा कापालिको से लेकर जैनी दिगम्बर और रामानंद जी के लश्कर से शंकराचार्य के अनुयायियों कि भीड़ मौजूद है…. यहां साधु लाल बती की वीआईपी सुरक्षा से लेकर पैदल मार्गी मिल जाते हैं।

संत उन्हें ‘ही’ कहा जाता है जो ब्रह्मचर्य पालन करते हैं लेकिन यदि कोई साधु ब्रह्मचर्य पालन न करें तो उसे कुआंरा साधु कहे तो यह गलत नहीं है।

संत साधन भी है जो परमात्मा​ के राह का राहबर है… साधु-संत प्रबल तेज से युक्त वह महात्मा है जो खुदा के काफी नजदीक है ये ऐसे वली हैं जिनकी सहायता से हम उनकी अभिशंसा युक्त अपने प्रार्थना पत्र को भगवान तक पहुंचा सकते हैं।

संत त्याग के भी परिचायक है जो मोह, इन्द्रिय इच्छा, सुख यहां तक कि दुख का भी त्याग करे वो साधु है गीता में स्थितप्रज्ञता का जो गुण वर्णित है वह अनिवार्य रुप से साधु-महात्माओ का अंग है तो साधु है।

साधु साहूकार होता है जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य वाला साहूकार नहीं... बल्कि वो साहूकार जो सभी कि सहायता का कार्य करें। साधु से साहू निकला है.. साधु का कार्य करें अर्थात साधुकार्य करने वाले से साहूकार बना है जो अब अपने मूल कार्य से विचलित हो कर शोषण धारी हो गए ।

साधु सहज के साथ सजग भी होता हैं जो आसपास के आवरण से सजग हो जो संयम शीलता के प्रति सजग हो , जो सजग रह कर श्वान निंद्रा लेता हो वह साधु है।

साधु कि निंदा हो सकती है ….पर जो साधु निंदक हो वह साधु नहीं हो सकता। इसी प्रकार साधु का अपमान तो हो सकता है लोग करते भी हैं….. पर यदि साधु खुद को अपमानित​ महसूस करे तो साधुता कहा है जो हसकर अपमान को भी टाल दें वह साधु है।

साधु किसी जाति से या समाज के नहीं होते वह तो जीव मात्र को सम्यक नजर में रखते हैं यदि भेद सादगी से जुड़ा हो तब भी साधु... साधु कि श्रैणी में नहीं रहता।

साधु भिक्षु भी है और दाता भी। साधु कल्याण कर्ता भी है और विघ्नहर्ता भी।

साधु सत्य है साधु चलित है साधु प्रेमातुर है साधु चैतन्य है साधु आनंदमय है।

“साधु वही है जो मुस्कुराता हुआ है”😊😊

साधुवाद _/\_🙏🙏

✍ भारत

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