Saturday, January 3, 2015

भला गुफ्तगू को मैं आगे बढाऊ केसे...
वो मेरे ही सवाल मुझ पे ,थोप के बैठी है..!

मेरे जवाब देख वो जवाब लिखती है शायद...
तभी पहले तुम बताओ, कहकर खामोश बैठी हैं..!

मेरे दिल के दरवाजे तक दस्तक देगी कैसे..
वो कुछ बातो को परदा कर, छुपा के बैठी हैं..!     

घर बसता है दिल मिलने से जिस्म नही ,'अजीब'
तभी घर में नही तबायफ ,कोठे पे बैठी है...!!

. . . भारत अजीब . . .          

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