** नया शहर **
जिंदगी की राह मे
न जाने कितने
शहर बद्ले
कभी इस दर को
तो कभी उस दर को
उम्र बीतती गई
रुह बढते गए
अनुभव क़ी होड मे
सपने बदले
तो कभी संभले
कही मित्र मिले
तो कही दोस्त बने
आज पुराना शहर
अपनी दांस्ता से नये
शहर को नया बनाता
इन सडक़ो पर
अपने मिलने से
कतराते है
तो कुछ अपने
ना होकर भी
अपने बन जाते है
आज इस शहर मे
अपनो को ढुंढता हुं
एक सपना लिए
एक दुंआ लिए
एक अरमान लिए
तो कभी लोगो
का फरमान लिए
जिंदगी है ये
चलना इसका
शौक है
अगर इस शहर मे
ना सही तो
और मे ही
कभी शौक है
तो कही शोंक है
--भारत--
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