बात ना इस जंहा की थी ना उस जंहा की
बात थी तो सिर्फ दो हयात की
ना समझ पाए तुम बातो के उन रज्म को
तुम आंखो के मताहीम सिर्फ सिफर रह गये
सफी बातो का वो परींदा रूस्तम बन गया
तुम इधर उधर के सिर्फ मुसाफिर रह गये
--भारत--
बात थी तो सिर्फ दो हयात की
ना समझ पाए तुम बातो के उन रज्म को
तुम आंखो के मताहीम सिर्फ सिफर रह गये
सफी बातो का वो परींदा रूस्तम बन गया
तुम इधर उधर के सिर्फ मुसाफिर रह गये
--भारत--
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