अजीब रुख मौसम ने बदला है !
कल का पंछी आज उड़ने लगा है
गेरो की उस महफिल में ...
दिल के उस कोने तक ...
हमारा भी कही नाम छुपा है !!
वो खुदा को खुद का समझता था !
पर, काफ़िर के दिल में भी ,
खुदा सा नूर दिखा है.....
तू भी मुझ सा लगता है
मै भी तो दीखता हु तुझ सा ..
फर्क सिर्फ रहा इतना
मुझे हिन्दू का घर तो ,,
तुझे मुस्लिम का मिला है !!!
इंसानी मोहब्बत तुने भी सीखी ...
प्यार का पैगाम मिला मुझको भी
कुछ दर्द तुने सहा ...
कुछ जख्म मिले मुझको भी
फर्क सिर्फ इतना रहा ....
खुदगर्ज ने खुद खातिर ,
तुझे मुजाहिर तो मुझे ..
काफ़िर का नाम दिया है !!!!!
-----भारत शोभावत कोटडी-----
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